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गीत-पहल

Rishabh Shukla


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I am Rishabh Shukla from Utterpradesh(Bhadohi). I love poems and I want to become a famous Hindi poet.

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इस माह के विशिष्ट रचनाकार :

                                                                       वीरेंद्र आस्तिक

 



सूरज लील लिए


हिरना

इस जंगल में

कब पूरी उम्र जिए


घास और पानी पर रहकर

सब तो, बाघों के मुंह से

निकल नहीं पाते

कस्तूरी पर वय चढ़ते ही

साये, आशीषों के

सर पर से उठ जाते

कस्तूरी के

माथे को

पढ़ते बहेलिए


इनके भी जो बूढ़े मुखिया होते

साथ बाघ के

छाया में पगुराते

कभी सींग पर बैठ

चिरैया गाती

या फिर मरीचिकाओं पर मुस्काते

जंगल ने

कितने

तपते सूरज लील लिए


पूर्णिमा वर्मन

 



आवारा दिन


दिन कितने आवारा थे

गली गली और

बस्ती बस्ती

अपने मन

इकतारा थे


माटी की

खुशबू में पलते

एक खुशी से

हर दुख छलते

बाड़ी, चौक, गली अमराई

हर पत्थर गुरुद्वारा थे

हम सूरज

भिनसारा थे


किसने बड़े

ख़्वाब देखे थे

किसने ताज

महल रेखे थे

माँ की गोद, पिता का साया

घर घाटी चौबारा थे

हम घर का

उजियारा थे