Geet-pahal

गीत-पहल

                         संरक्षक

माहेश्वर तिवारी

मुरादाबाद, उ. प्र., भारत


सत्यनारायण

पटना, बिहार, भारत 


गुलाब सिंह

इलाहाबाद, उ. प्र., भारत


               सम्पादकीय-परामर्श

 वेदप्रकाश 'अमिताभ'
अलीगढ, उ.प्र., भारत

बुद्धिनाथ मिश्र
देहरादून, उत्तराखंड
, भारत

 

महेश 'दिवाकर'

मुरादाबाद, उ.प्र., भारत

 

दिनेश सिंह
रायबरेली, उ.प्र., भारत

 

 

                   सम्पादक-मंडल

आनंद कुमार 'गौरव'
मुरादाबाद, उ.प्र., भारत

रमाकांत
रायबरेली, उ.प्र., भारत

 

अवनीश सिंह चौहान
इटावा, उ.प्र., भारत

 

योगेन्द्र वर्मा 'व्योम'
मुरादाबाद, उ.प्र., भारत

इस माह के विशिष्ट रचनाकार :

                                                                       वीरेंद्र आस्तिक

 



सूरज लील लिए


हिरना

इस जंगल में

कब पूरी उम्र जिए


घास और पानी पर रहकर

सब तो, बाघों के मुंह से

निकल नहीं पाते

कस्तूरी पर वय चढ़ते ही

साये, आशीषों के

सर पर से उठ जाते

कस्तूरी के

माथे को

पढ़ते बहेलिए


इनके भी जो बूढ़े मुखिया होते

साथ बाघ के

छाया में पगुराते

कभी सींग पर बैठ

चिरैया गाती

या फिर मरीचिकाओं पर मुस्काते

जंगल ने

कितने

तपते सूरज लील लिए


पूर्णिमा वर्मन

 



आवारा दिन


दिन कितने आवारा थे

गली गली और

बस्ती बस्ती

अपने मन

इकतारा थे


माटी की

खुशबू में पलते

एक खुशी से

हर दुख छलते

बाड़ी, चौक, गली अमराई

हर पत्थर गुरुद्वारा थे

हम सूरज

भिनसारा थे


किसने बड़े

ख़्वाब देखे थे

किसने ताज

महल रेखे थे

माँ की गोद, पिता का साया

घर घाटी चौबारा थे

हम घर का

उजियारा थे