Geet-pahal

गीत-पहल

 माह के विशिष्ट रचनाकार 


                                         वर्ष 201 1

   

                                वर्ष 201 2

                                 

 

डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया

 

जीकर देख लिया


जीकर देख लिया

जीने में

कितना मरना पड़ता है


अपनी शर्तों पर जीने की

एक चाह सबमें रहती है

किन्तु ज़िन्दगी अनुबंधों के

अनचाहे आश्रय गहती है

क्या-क्या कहना

क्या-क्या सुनना

क्या-क्या करना पड़ता है


समझोतों की सुइयां मिलतीं

धन के धागे भी मिल जाते

संबंधों के फटे वस्त्र तो

सिलने को हैं सिल भी जाते

सीवन,

कौन कहाँ कब उधड़े

इतना डरना पड़ता है


मेरी कौन बिसात यहाँ तो

सन्यासी भी साँसत ढ़ोते

लाख अपरिग्रह के दर्पण हों

संग्रह के प्रतिबिंब संजोते

कुटिया में

कौपीन कमंडल

कुछ तो धरना पड़ता है


 

 

डॉ राजेंद्र गौतम

 

शब्द सभी पथराए

 

बहुत कठिन 

संवाद समय से

शब्द सभी पथराए

 

हमने शब्द लिखा था-

'रिश्ते' 

अर्थ हुआ 'बाज़ार' 

'कविता' के माने 'ख़बरें' हैं 

संवेदन 'व्यापार'

भटकन की 

उँगली थामे हम 

विश्वग्राम तक आए

 

चोर-संत के 

अपने-अपने

रामायण के  'पाठ' 

तुलसी-वन को

फूँक रहा है

एक विखंडित काठ

नायक के गल 

फंदा डाले

अधिनायक मुसकाए

 

ऐसा जादू

सिर चढ़ बोला 

गूँगा अब इतिहास

दाँत तले उँगली दाबे हैं

रत्नाकर या व्यास

भगवानों ने 

दरवाज़े पर 

विज्ञापन लटकाए

 

 

अशोक अंजुम

 


 

 

कबिरा खड़ा उदास

 

होंठों पर मधुमास सजा है

अंतस में संत्रास

यहाँ-वहाँ हर ओर जगत में

मात्र विरोधाभास

 

जो हैं अपने 

सभी बगल में

छुरी दबाये हैं

अक्सर

विश्वासों से हमने

धोखे खाए हैं

वह उतना ही दूर निकलता

जितना लगता पास

 

सच्चाई के 

माथे पर हैं

बूँद पसीने की

कौन जानता

कला यहाँ पर

मरने-जीने की?

मृग-मरीचिका बनकर उभरे 

खुशियों का अहसास

 

इच्छाएँ हैं ढेर 

हमारी 

चादर छोटी है

पड़े-पड़े हम

रहें कोसते

किस्मत खोटी है

दो पाटन के बीच पिसें सब

कबिरा खड़ा उदास

 

यहाँ नैनसुख

आँखों पर हैं

पट्टी को बाँधे

जिनके ऊपर

भार सत्य का 

झुके वही काँधे

बरसे कम्बल, भीगे पानी

लगे नदी को प्यास


दिनेश सिंह

 

 

रण में बसर करते हुए!


व्यूह से तो निकलना ही है

समर करते हुए

रण में बसर करते हुए.


हाथ की तलवार में

बांधे कलम

लोहित सियाही

सियासत की चाल चलते

बुद्धि कौशल के सिपाही


जहर सा चढ़ते गढ़े जजबे

असर करते हुए

रण में बसर करते हुए.


बदल कर पाले

घिनाते सब

उधर के प्यार पर

अकीदे की आँख टिकती

जब नए सरदार पर


कसर रखकर निभाते

आबाद घर करते हुए

रण में बसर करते हुए.


धार अपनी मांज कर

बारीक करना

तार सा

निकल जाना है

सुई की नोक के उस पार सा


जिन्दगी जी जाएगी

इतना सफ़र करते हुए

रण में बसर करते हुए.

 

 
   माहेश्वर तिवारी


मन है


आज गीत

गाने का मन है

अपने को

पाने का मन है


अपनी छाया है

फूलों में

जीना चाह रहा

शूलों में


मौसम पर

छाने का मन है


नदी झील

झरनों सा बहना

चाह रहा

कुछ पल यों रहना


चिड़िया हो

जाने का मन है


                                  

इस माह के विशिष्ट रचनाकार :

                                                                       वीरेंद्र आस्तिक

 



सूरज लील लिए


हिरना

इस जंगल में

कब पूरी उम्र जिए


घास और पानी पर रहकर

सब तो, बाघों के मुंह से

निकल नहीं पाते

कस्तूरी पर वय चढ़ते ही

साये, आशीषों के

सर पर से उठ जाते

कस्तूरी के

माथे को

पढ़ते बहेलिए


इनके भी जो बूढ़े मुखिया होते

साथ बाघ के

छाया में पगुराते

कभी सींग पर बैठ

चिरैया गाती

या फिर मरीचिकाओं पर मुस्काते

जंगल ने

कितने

तपते सूरज लील लिए


पूर्णिमा वर्मन

 



आवारा दिन


दिन कितने आवारा थे

गली गली और

बस्ती बस्ती

अपने मन

इकतारा थे


माटी की

खुशबू में पलते

एक खुशी से

हर दुख छलते

बाड़ी, चौक, गली अमराई

हर पत्थर गुरुद्वारा थे

हम सूरज

भिनसारा थे


किसने बड़े

ख़्वाब देखे थे

किसने ताज

महल रेखे थे

माँ की गोद, पिता का साया

घर घाटी चौबारा थे

हम घर का

उजियारा थे